पता: मथुरा(उ.प्र)
यह उन कुंडों में से एक है जहां कृष्ण और बलराम अपनी गायों को पानी पीने के लिए लाते थे। जबकि गायों ने कुंड से पानी पिया और पेड़ों की छाया के नीचे विश्राम किया, कृष्ण और बलराम अपने दोस्तों के साथ शांतनु-कुंड के किनारे विभिन्न खेल खेलते थे।
पता: मथुरा (उ.प्र)
अराट या अरिष्टबन, ब्रज क्षेत्र के बारह वनों में से एक है, जो कृष्ण की लीलास्थली वृंदावन के निकट स्थित है |
पता: मथुरा (उ.प्र)
यहां पर ज़मीन के अंदर द्वापर युग से एक योगेश्वर बैठकर तपस्या कर रहे थे, उन्होंने बाहर निकलकर दंडवत प्रणाम किया।.
पता: मथुरा (उ.प्र)
बरसाना भारत के उत्तर प्रदेश राज्य के मथुरा ज़िले में स्थित एक नगर है। यह नगर हिन्दू देवी राधा के जन्मस्थल के रूप में भी प्रचलित है।
पता: मथुरा (उत्तर प्रदेश)
यह बैठक श्री मथुरा के विश्राम घाट पर स्थित है। यहां पर सिकंदर लोदी के शासनकाल में एक यंत्र लगवाया गया था।
पता: मथुरा (उत्तर प्रदेश)
नंद बैठक नंद बैठक वह स्थान है जहां नंदराय अपने सहयोगी मित्रों और हितैषियों से विचार- विमर्श किया करते थे।
पता: मथुरा(उत्तर प्रदेश)
संकेत और चमत्कार उन अनुभवों को संदर्भित करते हैं जिन्हें आधुनिक ईसाई अनुभव में आदर्श के रूप में चमत्कारी माना जाता हैं।
पता: ब्रज
प्राचीन काल में यह एक विशाल सघन बन था, जो वर्तमान मथुरा के सामने यमुना के उस पार वाले दुर्वासा आश्रम से लेकर सुदूर दक्षिण तक विस्तृत था। पुराणों में इसका उल्लेख बृहद्बन, महाबन, नंदकानन, गोकुल, गौब्रज आदि नामों से हुआ है।
पता: वृन्दाबन
ब्रज में उपवन, जिन्हें 'पवित्र उपवन' भी कहा जाता है, धार्मिक और सांस्कृतिक रूप से महत्वपूर्ण हैं, जो प्राचीन काल से ही प्रकृति और धर्म के बीच संबंध को दर्शाते हैं।
पता: ब्रज
उत्तर प्रदेश के मथुरा ज़िले के कोसी कलां में स्थित एक शनि मंदिर है. यह मंदिर घने जंगलों के बीच बना है. कोकिलावन को कोकिला वन धाम के नाम से भी जाना जाता हैं।
पता: ब्रज
ब्रज में संरक्षित बनखंडो के रूप में कुछ कदंबखंडियाँ थी, जहाँ बहुत बड़ी संख्या में कदंब के वृक्ष लगाये गये थे। उन रमणीक और सुरभित उपबनों के कतिपय महात्माओं का निवास था।
पता: ब्रज
ब्रज में उपवनों को भगवान कृष्ण की लीलास्थली और तपोभूमि माना जाता है, जहाँ वे विभिन्न वनस्पति और जीव-जंतुओं के साथ रहते थे।
पता: ब्रज
वह वृन्दाबन पंचयोज अर्थात बीस कोस परधि का तथा ॠषि मुनियों के आश्रमों से युक्त और सघन सुविशाल बन था। ३ वहाँ गोप समाज के सुरक्षित रूप से निवास करने की तथा उनकी गायों के लिये चारे घास की पर्याप्त सुविधा थी।
पता: ब्रज
प्राचीन काल में यह एक विशाल सघन बन था, जो वर्तमान मथुरा के सामने यमुना के उस पार वाले दुर्वासा आश्रम से लेकर सुदूर दक्षिण तक विस्तृत था। पुराणों में इसका उल्लेख बृहद्बन, महाबन, नंदकानन, गोकुल, गौब्रज आदि नामों से हुआ है। उस बन में नंद आदि गोपों का निवास थ
पता: ब्रज
उपवनों को धार्मिक रूप से संरक्षित माना जाता है, इसलिए लोग उनकी कटाई नहीं करते और उनकी रक्षा करते हैं।
पता: ब्रज
कोटवन, हिन्दू धर्म की वैष्णव परंपरा के लिए एक पवित्र स्थल है. यह ब्रज और शीतलकुंड की पूजा से जुड़ा है. राधा-कृष्ण के भक्त हर साल यहां आते हैं और कई त्योहारों में भाग लेते हैं।
पता: ब्रज
वह वृन्दाबन पंचयोज अर्थात बीस कोस परधि का तथा ॠषि मुनियों के आश्रमों से युक्त और सघन सुविशाल बन था। ३ वहाँ गोप समाज के सुरक्षित रूप से निवास करने की तथा उनकी गायों के लिये चारे घास की पर्याप्त सुविधा थी।
पता: ब्रज
वृन्दाबन का महत्व सदा से श्रीकृष्ण के प्रमुख लीला स्थल तथा ब्रज के रमणीक बन और एकान्त तपोभूमि होने के कारण रहा है। मुसलमानी शासन के समय प्राचीन काल का वह सुरम्य वृन्दाबन उपेक्षित और अरक्षित होकर एक बीहड़ बन हो गया था।
पता: ब्रज
कोटवन का नामकरण "कोट" शब्द से हुआ है, जिसका अर्थ होता है "किला" या "परकोटा"। कहा जाता है कि यह वन इतना घना और संरक्षित था कि यह एक किले जैसा लगता था।
पता: ब्रज
चमेली वन, ब्रज क्षेत्र में स्थित एक प्राचीन और धार्मिक रूप से महत्वपूर्ण वन है, जहाँ भगवान श्रीकृष्ण के लीला स्थलों और हनुमान जी के मंदिर का उल्लेख मिलता है।
पता: ब्रज
जय श्री कृष्णा जय श्री राधे || "श्री कुंड" "महाप्रभुजी की बैठक" यहां के दर्शन आपको कामवन में होते हैं जिसको आदि वृंदावन भी कहा जाता है।
पता: ब्रज
गोकुल भारत के उत्तर प्रदेश राज्य के मथुरा ज़िले में स्थित एक नगर है।गोकुल मथुरा से पूर्वी-दक्षिणी दिशा में १५.८ किलोमीटर की दूरी पर स्थित है।
पता: ब्रज
एक बार श्री राधा रानी रास-लीला के मध्य एक उदास मनोदशा (मान) में थीं । रास-लीला वृन्दावन धाम में मनोहर जगह हो रही थी। मान की लीला में उन्होंने रास लीला का त्याग कर, यमुना को पार करके वो एक एकांत वन में आ गई।
पता: ब्रज
ब्रज में संरक्षित वनखंडो के रुप में कुछ कदंब खंडियाँ थी, जहाँ बहुत बड़ी संख्या में कदंब के वृक्ष लगाये गये थे. उन रमणीक और सुरभित उपवनों के कतिपय महात्माओं का निवास था. कवि जगतनंद ने अपने काल की चार कदंवखंडियों का विवरण प्रस्तुत किया हैं।