पता: गोकुल (उत्तर प्रदेश)
"यमुनाष्टक" श्री वल्लभाचार्यजी द्वारा रचित एक अत्यंत पावन स्तुति है जो श्री यमुनाजी की महिमा का वर्णन करती है। यह स्तुति पुष्टिमार्ग में अत्यंत महत्त्वपूर्ण मानी जाती है और नित्य सेवा में गाई जाती है। इसमें श्री यमुनाजी को भक्तों को भगवत्प्राप्ति कराने वा
पता: वैष्णव प्रकाशन, नाथद्वारा,
"श्री वल्लभ बोध" (या "वल्लभ बोध") श्री वल्लभाचार्य जी द्वारा रचित एक महत्वपूर्ण ग्रंथ है, जो पुष्टिमार्ग के तात्त्विक सिद्धांतों को सरल, संक्षिप्त और स्पष्ट रूप में प्रस्तुत करता है। यह ग्रंथ विशेषकर नवदीक्षित वैष्णवों को मार्गदर्शन देने हेतु रचा गया है।
पता: नाथद्वारा, कांकरोली, सुरत
श्री सिद्धांत रहस्य" श्री वल्लभाचार्य जी द्वारा रचित पुष्टिमार्ग के प्रमुख षोडश ग्रंथों (16 मूल ग्रंथों) में से एक है। यह ग्रंथ अद्वैत ब्रह्मवाद और शुद्ध अद्वैत के बीच के अंतर को स्पष्ट करता है और पुष्टिमार्ग के शुद्ध अद्वैत सिद्धांत की रक्षा करता है।
पता: नाथद्वारा, कांकरोली, सुरत आदि के वैष्णव पुस्तकालय
"श्री पुष्टि प्रवाह मर्यादा" श्री वल्लभाचार्य जी द्वारा रचित पुष्टिमार्ग के 16 मूल ग्रंथों (षोडश ग्रंथ) में से चतुर्थ (4th) स्थान पर है। यह ग्रंथ पुष्टिमार्गीय जीवनशैली, आचरण और सेवा पद्धति की मर्यादाओं (नियमों) को स्पष्ट करता है।
पता: नाथद्वारा, कांकरोली, मुंबई, सुरत आदि वैष्णव प्रकाशन
"श्री भक्तिवर्धिनी" श्री वल्लभाचार्य जी द्वारा रचित पुष्टिमार्ग के षोडश ग्रंथों (16 ग्रंथों) में से 5वाँ ग्रंथ है। इसका उद्देश्य है – भक्ति को कैसे बढ़ाया जाए (वर्धन किया जाए) — इस पर प्रकाश डालना।
पता: नाथद्वारा, कांकरोली, मुंबई
जलभेद" श्री वल्लभाचार्य जी द्वारा रचित एक लघु किंतु महत्वपूर्ण ग्रंथ है। यह ग्रंथ मुख्य रूप से "जीव, ब्रह्म और संसार" के पारस्परिक संबंध, भिन्नता और तात्त्विक स्वरूप को सरल भाषा में समझाता है। इसमें “जल” (पानी) के विभिन्न प्रकारों के माध्यम से दार्शनिक भ
पता: नाथद्वारा, कांकरोली, वाराणसी, मथुरा में पुष्टिमार्गीय
"श्री कृष्णाश्रय" श्री वल्लभाचार्यजी द्वारा रचित पुष्टिमार्ग के षोडश (16) मूल ग्रंथों में से छठा (6वाँ) ग्रंथ है। इस ग्रंथ का मूल उद्देश्य है — भक्त किसे अपना आश्रय माने?, और आश्रय की सच्ची भावना क्या होनी चाहिए?
पता: नाथद्वारा, कांकरोली, मथुरा, सुरत
"विवेकधैर्याश्रय" श्री वल्लभाचार्य जी द्वारा रचित पुष्टिमार्ग के षोडश ग्रंथों (16 ग्रंथों) में से सप्तम (8वाँ) स्थान पर आता है। इस ग्रंथ में जीवन की कठिन परिस्थितियों में वैष्णव को विवेक (बुद्धिमत्ता), धैर्य (सहनशीलता), और आश्रय (कृष्ण में पूर्ण विश्वास)
पता: नाथद्वारा, कांकरोली, सुरत, मुंबई
"श्री सुबोधिनी" श्री वल्लभाचार्य जी द्वारा रचित एक महान ग्रंथ है जो श्रीमद्भागवत महापुराण पर विस्तृत टीका (भाष्य) है। यह ग्रंथ पुष्टिमार्ग की दृष्टि से सर्वाधिक महत्वपूर्ण ग्रंथों में से एक है। इसमें श्री वल्लभाचार्य जी ने भागवत के गूढ़ और रहस्यात्मक श्ल
पता: नाथद्वारा, कांकरोली, मथुरा, सूरत
"अन्तःकरणप्रबोध" श्री वल्लभाचार्य जी द्वारा रचित षोडश (१६) ग्रंथों में से आठवाँ ग्रंथ है। इस ग्रंथ का उद्देश्य है।, अन्तःकरण (मन, बुद्धि, चित्त, अहंकार) को जाग्रत (प्रबुद्ध) करना, उसे शुद्ध बनाकर श्रीकृष्ण की भक्ति में लगाना।
पता: नाथद्वारा, कांकरोली, मथुरा, मुंबई
"श्री सेवा फलम्" श्री वल्लभाचार्य जी द्वारा रचित षोडश ग्रंथों (16 ग्रंथ) में से ग्यारहवाँ (11वाँ) ग्रंथ है। इस ग्रंथ का उद्देश्य है: भगवान श्रीकृष्ण की सेवा का महत्त्व बताना,सेवा करने से मिलने वाले आध्यात्मिक फल (लाभ) का वर्णन करना।
पता: नाथद्वारा, कांकरोली, मथुरा, सूरत आदि वैष्णव
"श्री नव रत्न" श्री वल्लभाचार्य जी द्वारा रचित पुष्टिमार्ग के षोडश (१६) ग्रंथों में से बारहवाँ (12वाँ) ग्रंथ है। इस ग्रंथ में वैष्णव जीवन के लिए अत्यंत उपयोगी नौ (9) आध्यात्मिक रत्नों का वर्णन है, जो श्रीकृष्णभक्ति के मार्ग को सुंदर, सरल और दिव्य बनाते ह
पता: नाथद्वारा, मथुरा, सूरत, कांकरोली
"श्री सर्व निर्णय" श्री वल्लभाचार्य जी द्वारा रचित षोडश (१६) ग्रंथों में से तेरहवाँ (13वाँ) ग्रंथ है। इस ग्रंथ का उद्देश्य है,विभिन्न आध्यात्मिक विचारों और मतों के बीच पुष्टिमार्गीय भक्ति और तत्त्वज्ञान का "सर्वश्रेष्ठ निर्णय" प्रस्तुत करना।
पता: नाथद्वारा, मथुरा, वाराणसी
"सिद्धान्त मुक्तावली" श्री वल्लभाचार्य जी द्वारा रचित एक अत्यंत महत्वपूर्ण दार्शनिक ग्रंथ है। यह ग्रंथ पुष्टिमार्ग का तत्वदर्शन प्रस्तुत करता है और इसे "मुक्ता-मालिका" (मोती-माला) की तरह माना गया है – जिसमें प्रत्येक श्लोक एक अमूल्य "मुक्ता" (सिद्धान्त)
पता: नाथद्वारा, मथुरा, कांकरोली, सूरत
श्री नित्यसेवा" श्री वल्लभाचार्य जी द्वारा रचित पुष्टिमार्ग के षोडश ग्रंथों (16 ग्रंथ) में से चौदहवाँ (14वाँ) ग्रंथ है। इस ग्रंथ में भगवान श्रीनाथजी (श्रीकृष्ण) की दैनिक सेवा (नित्य सेवा) का नियम, क्रम, भावना और विधि का वर्णन किया गया है।
पता: नाथद्वारा, मथुरा, सूरत, वाराणसी
"चतुःश्लोकी" का अर्थ है चार श्लोकों वाला ग्रंथ। यह श्री वल्लभाचार्य जी द्वारा रचित पुष्टिमार्ग के षोडश ग्रंथों (16 ग्रंथ) में अंतिम (16वाँ) और अत्यंत सारगर्भित ग्रंथ है।यह ग्रंथ केवल चार श्लोकों में ही पुष्टिमार्ग का संपूर्ण सार प्रस्तुत करता है।